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श्राद्ध

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श्राद्ध :-- [ आज 19 दिनों के बाद इन्टरनेट से जुड़ने का समय मिला है, वह भी टेबलेट पर (उत्तर बिहार के) धीमे इन्टरनेट से |] कुछ लोगों ने सुझाव भेजे हैं कि श्राद्ध के भोज आदि में अनावश्यक खर्च न करें, न्यूनतम खर्च में अन्त्येष्टि कार्य संपन्न करें | कई लोग श्राद्ध के भोज का अर्थ नहीं समझते, पूँजीवादी अ-समाजशास्त्र और अनर्थशास्त्र के तथाकथित ज्ञाता यह नहीं बतलायेंगे कि सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर भोज की परम्परा प्राचीन  "वसुधैव कुटुम्बकं"  के दर्शन का अवशेष है जब दान से लाभ  मिलने पर लोगों का विश्वास था, आज दान के बदले  "बचत"  और बैंक-बैलेंस पर भरोसा है | सरकार भी गिफ्ट पर टैक्स ठोकती है, और बचत पर सूद देती है, जो प्राचीन धर्मशास्त्र के ठीक उलट है | धर्मशास्त्र उलटा था या आज का समाज उलटा हो गया है ? सत्य को जीवन में महत्व देने वाला सतयुग उलटा था या कलियुग का दुमुंहा सांप सरीखा मनुष्य उलटा हो गया है जो बातें तो बड़ी-बड़ी करता है लेकिन अपने सगे-संबंधियों  को भी उनकी मृत्यु होते ही कूड़ेदानी के लायक समझता है ?  "श्राद्ध"  शब्द  'श्रद्धा'  से सम्बन्...

जोशीमठ के भूस्खलन-धंसाव व घरों मकानों पर दरार

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जोशीमठ के भू स्खलन  भू धंसाव व घरों मकानों पर पड़ रही दरारों को लेकर सरकार द्वारा गठित वैज्ञानिकों की कमेटी की रिपोर्ट आ गयी है । रिपोर्ट में बहुत से कारकों को इसके लिए जिम्मेदार बताया है जिनमें नदी के कटाव, पानी निकासी, सीवेज की व्यवस्थित निकासी न होने, अत्यधिक निर्माण के चलते भूमि पर दबाब आदि को चिन्हित किया है ।  किन्तु विऐज्ञानिकों विशेषज्ञों की इस कमेटी ने जोशीमठ के ठीक नीचे से गुजर रही तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना की सुरंग को इन कारकों में चिन्हित नहीं किया है । जबकि इससे पूर्व हमारे आग्रह पर स्वतंत्र वैज्ञानिकों की एक टीम ने एनटीपीसी की इस सुरंग को भी भूस्खलन के कारण के रूप में चिन्हित किया था ।  रोचक तथ्य है कि सरकार द्वारा गठित वैज्ञानिकों की कमेटी के अध्यक्ष व प्रमुख भूगर्भ वैज्ञानिक आपदा प्रबन्धन विभाग के निदेशक डॉ पियुष रौतेला व अन्य भूगर्भ शास्त्री डॉ एम पी एस बिष्ट के साइंस जनरल में छपे शोध पत्र में एनटीपीसी द्वारा बनाई जा रही विद्युत परियोजना की इस सुरंग से जोशीमठ में भू स्खलन होने की संभावना व्यक्त की गई है । 12 वर्ष पूर्व छपे शोधपत्र में...

चैतन्य ब्रह्माण्ड का सप्तवायु

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चैतन्य ब्रह्माण्ड का सप्तवायु प्रवह आदि सप्तवायु के बारे में इण्टरनेट पर पूर्णतया भ्रामक सूचनायें सभी वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं । इन तथाकथित हिन्दुओं में इतना विकासवादी अहङ्कार है कि ‘पिछड़े’ युग के वेदव्यास जी द्वारा सङ्कलित पुराणों तथा महाभारत को देखने का प्रयास भी नहीं करते और अपनी मनगढ़न्त बकवास को वेदव्यास जी के नाम पर उद्धृत करते रहते हैं । अपनी बकवास करनी ही है तो अपने नाम से करें,महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर झूठ बकना ऋषियज्ञ का विलोम फल देता है,किन्तु विकासवादियों को पाप−पुण्य भी ऋषियों के ‘पिछड़े’ युगों की बकवास लगती हैं । सप्तवायु का क्रम भी ये लोग गलत बताते हैं और अर्थ भी । पुराणों की तुलना में महाभारत अधिक विस्तार से इस विषय की जानकारी देता है । महाभारत के शान्तिपर्व अध्याय−३१५ में सप्तवायु का क्रम निम्न है और मूल श्लोक संलग्न स्क्रीनशॉट में है जिसका अर्थ गीताप्रेस की हिन्दी टीका में देखें ।  संलग्न स्क्रीनशॉट के संस्कृत पाठ से गीताप्रेस के संस्कृत पाठ में कई स्थलों पर मैंने महत्वपूर्ण अन्तर देखे हैं,गीताप्रेस का मूल संस्कृत पाठ बेहतर है । श्लोक−३६ से प्रवहादि सप...

राशी-द्वार

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******** सर्वोत्तम पूजा-श्राद्ध तर्पण ******** ===============================      हिन्दू सनातन धर्म के ऋषिमुनि , ब्राह्मण , तपस्वी नित्य भगवान सूर्यनारायण को अर्घ्य देना , अग्निहोत्र पूजा एवं नदी सरोवर तीर्थ स्नानमे तर्पण नित्य ही करते है और सनातन धर्म की ये श्रेष्ठ पूजा उपासना है । देव , गुरु और पितृओ कि प्रसन्ता से ही सर्वमंगल होता है । इसलिए ही प्रतिमास या भाद्रपद के इस पितृपूजा पक्षमे श्राद्ध तर्पण अवश्य ही करना चाहिए । पितृओ कि प्रसन्ता के बिगैर स्वयम ब्रह्म भी फलदायी नही होते ।  पितृपक्ष का रहस्य :-  ये ब्रह्मांड बाराह राशीओ से बंधा हुवा है । मेष राशि ब्रह्मांड का प्रवेश द्वार है । मीन राशि का द्वार देवलोक ( सूर्यलोक ) की ओर है । कन्या राशि का द्वार पितृलोक ( चंद्रलोक ) की ओर है । जब किसी की मृत्यु होती है तब जीव कर्मानुसार इनमे से एक द्वार की ओर गति करता है । सद कर्म , सदाचार ओर पैरोकारी जीव अपने पुण्यबल से सूर्यलोक जाता है । बाकी जीव पितृयान ( चन्त्रलोक ) में गति करते है । चंद्र सूक्ष्म सृष्टि का नियमन करते है ।       स...

भद्रा पर सम्पूर्ण व्याख्या

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भद्रा पर सम्पूर्ण व्याख्या 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ धन्या दधमुखी भद्रा महामारी खरानना। कालारात्रिर्महारुद्रा विष्टिश्च कुल पुत्रिका। भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयन्करी। द्वादश्चैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। न च व्याधिर्भवैत तस्य रोगी रोगात्प्रमुच्यते। गृह्यः सर्वेनुकूला: स्यर्नु च विघ्रादि जायते। देवदानवसंग्राम आख्यान  〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पूर्वकाल में जब देवताओ और असुरो का युद्घ हुआ तो देवगण हारने लगे तब शिवजी को क्रोध आ गया शिवजी की आँखे एकदम सुर्ख लाल हो गयी, दसों दिशाएं कांपने लगी इसी समय शिवजी की दृष्टि उनके हृदय पर पड़ी और उसी समय एक गधी के सामान गरदन सिंह के समान सात हाथो से व तीन पैरों से युक्त कौड़ी के समान नेत्र पतला शरीर  कफन जैसे वस्त्रो को धारण किये हुए धुम्रवर्ण की कान्ति से युक्त विशाल शरीर धारण किये हुए एक कन्या की उतपत्ति हुई जिसका नाम "भद्रा" था।  देवताओ की तरफ से असुरो से युद्घ करते हुए असुरो का विनाश कर डाला देवताओ की विजय हुई,तब देवगण प्रसन्न होकर उसके कानो के पास जाकर कहा  👉 दैत्यघ्नी मुदितै: सुरैस्तु करणं          ...

शिवसहस्त्र नाम स्तोत्र

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******* शिवसहस्त्र नाम स्तोत्र ********* ========================== एको हि रुद्रो न द्वितीयाय‌ तस्थु-            र्य इमाॅंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यड्. जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले         ‌‌ संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा :।  वह रुद्र एक ही हैं उसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है,वह अपनी ब्रह्मादि शक्तियों के द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है,वह ब्रह्म शक्ति से उत्पति, विष्णु शक्ति से पालन, रुद्र शक्ति से संहार करता है। वह परमेश्वर समस्त जीवों के भीतर स्थित हो रहा है,यह ब्रह्म, विष्णु, महेश्वर एक ही परमेश्वर की तीन शक्तियां हैं।     आजके समयमे कही ऐसे लोग अज्ञानवश देवो की तुलना करते है । ब्रह्मा , विष्णु , महेश , गणपति , सूर्य या शक्ति इनमें बड़ा कौन ? वैदिक काल के ऋषियोने निराकार ब्रह्म शिव के पंच तत्व ओर उन तत्व के देवताओ की पुर्ण समज वेद उपनिषदों में प्रकाशित की है । किंतु पुराणोक्त काल के ऋषियो ने जिस जिस देवता का महात्यम चरित्र प्रकाशित किया तब उन देवताके उपासक भ्रमित न हो इसलिए सारे देवी देवताओ को उस द...

देवशयनी एकादशी

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********* देवशयनी एकादशी ******** ========================== "शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥" देवशयनी एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण बड़ी एकादशी कहते है । क्योंकि सूर्य दक्षिणायन होते ही चंद्रमा की ऊर्जा बलवतर बनती है और एकादशी पर उनका ऊर्जा प्रवाह पृथ्वी पर होता है । इसलिए साल की सभी 24 एकादशी मे सबसे ज्यादा लाभ इस एकादशी को मिलता है । उपवास से नाभि गरम होती है और मणिपुर चक्र सक्रिय हो जाता है। तिथि के तत्व देवता की शक्ति जागृत होती है , इसलिए उनका यजन पूजन , स्तोत्र , जाप से उनकी प्रसन्नता प्राप्त होती है । महानारायण का नाम , मंत्र , विष्णु सहस्त्र पाठ शीघ्र फलदायी होता है । वैज्ञानिक तथ्य :-  हमारा ये ब्रह्मांड राशि और नक्षत्रों से बंधा हुवा है । हरेक मनुष्य और पशु पक्षी एवं जड़ पदार्थो पर भी अवकाशी Cosmic ऊर्जा की भिन्न भिन्न असर होती है ये विज्ञान सम्मत सिद्धान्त है । पूर्णिमा के आसपास मेन्टल होस्पिटलो मे दर्दी का उन्माद ( पागलपन ) बढ़ जाता है...