सनातन धर्म में मूर्ति पूजा के विरोध का खंडन
आधुनिक पढ़े लिखे लोग की बुद्धि में भौतिक पढाई की पराकाष्ठ पर चढ़ जाने के बाद पूजा-इश्वर वगैरह मान्य नहीं, होना चाहिए, मूर्तिपूजा का विरोध होना चाहिए, लेकिन क्या वाकई में परम-सत्ता के बनायी श्रृष्टि में ऐसा होता है?
क्या जो मूर्ती पूजा करते हैं, वो मूर्ख होते हैं? और अधिक डिग्री वाले लोग वाकई में विद्वान कहलाने के योग्यता रखता हैं? क्यूंकि जिसे जानना चाहिये, उसे ही न जाना, तो ये सारी श्रृष्टि में कुछ अन्य जान्ने का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन उस एक को जान लिए तो अन्य कुछ भी जानना एवं हासिल करना शेष नहीं रहता.
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यह शत-प्रतिशत झूठा प्रचार है कि सनातन धर्म में मूर्ति पूजा नहीं थी | भारत की प्राचीनतम मूर्तियाँ जैनियों या बौद्धों की नहीं हैं | सबसे पहले यह प्रचार अंग्रेजों ने आरम्भ किया कि भारत में ग्रीक राजाओं ने मूर्ति-पूजा आरम्भ की , और बाद में ब्रह्म-समाज के छद्म-ईसाईयों तथा आर्यसमाजियों जैसे अनेक दिग्भ्रमित हिन्दुओं ने भी इस प्रचार को हवा दी | हिन्दुओं में मूर्ति-पूजा का विरोध इस्लाम और बाद में इससे मतों के प्रभाव का परिणाम है |
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वैदिक यज्ञ में यज्ञ के इष्ट देवता की मूर्ति नहीं बनती | वैदिक यज्ञ में देवता साक्षात उपस्थित होकर हवि ग्रहण करते हैं | उनका दर्शन बाह्य चक्षु द्वारा सम्भव तबतक सम्भव नहीं जबतक देवता स्वयं न चाहें |
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यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में परम पुरुष (ब्रह्म) के बारे में कहा गया है कि उसकी कोई प्रतिमा नहीं है, किन्तु यह तो आज तक की भी मान्यता रही है -- ब्रह्म (परब्रह्म) और ईश्वर की कोई प्रतिमा कभी नहीं बनी है क्योंकि ब्रह्म और ईश्वर कभी मूर्त रूप में प्रकट नहीं होते (ब्रह्म और ईश्वर में केवल इतना अन्तर है कि ब्रह्म के उस स्वरुप को ईश्वर कहते हैं जो लोककल्याण की "इच्छा" करे, "इच्छा" शब्द के धातु से ही "ईश्वर" शब्द बना है)| मूर्ति केवल उन देवों या अन्य प्राणियों की हो सकती है जो मूर्त रूप में प्रकट हो सकते हैं | इसका ये अर्थ कतई नहीं है की हमारी बनायी हुई मूर्ती में वो नहीं आ सकता. हम जिस रूप में चाहें, वो उस रूप में आ सकता है, क्यूंकि न तो उसकी कोई सीमा निर्धारित हो सकती है, ना कोई गुण, न कोई गंध इत्यादि
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बात ये है कि हर किसी को वैदिक यज्ञ करने की क्षमता नहीं होती, विशेषतया कलियुग में |
जो कहते हैं कि देवता सर्वव्यापी होते हैं अतः मूर्ति पूजा अनुचित है, उनसे पूछना चाहिए कि जब देवता सर्वव्यापी हैं तो मूर्ति में क्यों नहीं हो सकते ?
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"मूर्ति" शब्द का अनेक वैदिक ग्रन्थों में उल्लेख है, जैसे कि ताण्ड्य-ब्राह्मण, अनेक उपनिषदों, मनुस्मृति, पुराण-महाकाव्यादि आदि में | जो दुष्ट लोग वैदिक ग्रन्थों को प्रामाणिक नहीं मानते वे मौर्यकालीन पञ्चतन्त्र को तो मानेंगे न ? पञ्चतन्त्र में मूर्ति का उल्लेख है, उस काल तक की जैनियों या बौद्धों की कोई मूर्ति नहीं प्राप्त हुई है | "मूर्त" शब्द का यजुर्वेद की तैत्तीरीय संहिता (दक्षिण भारत का मुख्य वेद) में उल्लेख है और शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता (उत्तर भारत का मुख्य वेद) के शतपथ ब्राह्मण में भी उल्लेख है | "प्रतिमा" शब्द का उल्लेख यजुर्वेद की मैत्रायणी और वाजसनेयी संहिताओं , तैत्तीरीय आरण्यक, अथर्ववेद, आदि में है |
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मूर्त रूप के लिए चार तत्व आवश्यक हैं -- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु (आकाश को मूर्त नहीं माना गया, किन्तु आकाश भी मूर्ति में रहता ही है)| अतः मूर्त का अर्थ है पञ्चभौतिक आकृति लेना | दिव्य शक्तियाँ पञ्चभौतिक नहीं होतीं, अतः मूर्ति उनका वास्तविक स्वरुप नहीं है, केवल मनुष्यों के प्रयोजनार्थ है | अमूर्त का ध्यान करना सबके बूते की बात नहीं है |
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अतः ईश्वरीय विधान के अनुसार ही विभिन्न दिव्य शक्तियाँ विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं और तदनुसार ही उनकी प्रतिमाएं बनतीं हैं |
प्रतिमा में दिव्य शक्ति तब तक नहीं आ सकती जबतक सही तरीके से प्रतिमा न बने और सही तरीके से प्राण-प्रतिष्ठा न हो | अतः हिन्दुओं में मूर्ति की पूजा नहीं होती, मूर्ति में प्रतिष्ठित दिव्य शक्ति की पूजा होती है |
वैसे मूर्ति तो केवल प्रतीक है | प्रतीक रूप, शब्द, आदि किसी भी प्रकार का हो सकता है | इस्लाम में "अल्लाह" का प्रतीक शब्द है, किन्तु हिन्दुओं में ब्रह्म और ईश्वर के प्रतीक उन शब्दों के साथ-साथ "ॐ" या "प्रणव" भी है और अन्य देवताओं के प्रतीक नामों के अलावा प्रतिमा भी प्रतीक हैं | अतएव प्रतीक-पूजन संसार के सभी सम्प्रदायों में है, नास्तिकों और वैज्ञानिकों में भी उनके अपने प्रतीकों की पूजा है |
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आधुनिक वैज्ञानिक भी "भौतिक-पदार्थ" की पूजा करते हैं, परन्तु उनकी पूजा में धूप-दीप-ताम्बूल के स्थान पर दूरबीन आदि यंत्रों का प्रयोग होता है | समस्त अवधारणाएँ, विचार, अभिव्यक्ति, आदि प्रतीकों के माध्यम से ही सम्भव हैं | बिना प्रतीकों के किसी भी सत्य को व्यक्त नहीं किया जा सकता | सत्य अमूर्त होता है, उसका व्यक्त रूप "मूर्त" है | व्यक्त स्वरुप किसी भी पञ्चभौतिक तत्व वा तत्वों का हो सकता है | जिस प्रकार "अल्लाह" एक प्रतीक है उसी प्रकार किसी देवता की मूर्ति भी एक प्रतीक है, किन्तु प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात उस स्थान विशेष में स्थापित उस विशेष मूर्ति से उस देवता का सम्बन्ध बन जाता है | यदि मूर्ति के माध्यम से किसी दिव्य शक्ति की पूजा न होकर केवल मूर्ति की पूजा हो तो यह हेय है |
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गायत्री मन्त्र सर्वप्रमुख वैदिक मन्त्र है | इसमें सविता देव के "भर्ग" (ब्रह्मतेज) के ध्यान का विधान है | अतः यहाँ भी अमूर्त देव के मूर्त स्वरुप का ही ध्यान है -- तेज का | मूर्ति मानवाकार ही हो यह आवश्यक नहीं |
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अमूर्त भावों के मूर्त माध्यमों द्वारा सम्प्रेषण को कला कहते हैं | भाव को अभिव्यक्त तो हर कोई कर सकता है, किन्तु उसे सम्प्रेषित करने की क्षमता जिसमे हो उसे कलाकार कहते हैं | उसी प्रकार भक्त भी अपने भाव को इष्ट तक पँहुचाने का प्रयास करता है, जिसमें मूर्ति जैसे माध्यम सहायता करते हैं | जिनमें बिना मूर्ति के अमूर्त का ध्यान करने की क्षमता है वे मूर्तिपूजा का विरोध नहीं करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि दूसरों को इससे लाभ है, और वे यह भी जानते हैं कि सही तरीके से स्थापित मूर्तियों में दिव्य शक्ति प्रतिष्ठित रहती है |
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किसी प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति को तोड़ने या अन्य प्रकार से किसी देवता का अपमान करने से देवता को कोई क्षति नहीं पंहुचती , क्योंकि कोई भी देवता केवल उसी एक मूर्ति में सीमित नहीं रहते, किन्तु अपमान करने वाले का पुण्य नष्ट होता है |
वेदव्यास जी का कथन है कि सतयुग में लोग मुख्यतः ध्यान करते थे, त्रेता में यज्ञ की प्रधानता थी |
अतः जबतक धर्म सबल था तबतक मन्दिर और मूर्ति अनावश्यक थे, यद्यपि त्रेतायुग में मूर्तिपूजा का आरम्भ हो गया था (जैसे कि रामेश्वरम)| कलियुग में याज्ञिक वेदमार्ग अवरुद्ध रहता है, यज्ञों के नाम पर प्रायः धन्धा होता है, अतः मूर्तिपूजा की ही प्रधानता रहती है |
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ऐसा हर महायुग में होता है | अतः किसी एक कालखण्ड को "वैदिक युग" या सतयुग कहना सनातन धर्म का विरोधी विचार है | एक सृष्टि में एक हज़ार बार कलियुग आता है और तब मूर्तिपूजा ही आस्तिकों का प्रमुख सम्बल रहता है , क्योंकि ज्ञानमार्ग विरलों के लिए ही है |
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मनुस्मृति के चौथे अध्याय का श्लोक-39 पढ़ें, उसमें स्नातक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए उल्लेख है कि स्नातक को "मिट्टी (का टीला), गाय, देव-प्रतिमा, ब्राह्मण, घी, मधु, चौराहा तथा जानी-पहचानी वनस्पतियों (के पास से गुजरते समय) उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए (प्रदक्षिणा का अर्थ है उनकी ओर दाहिना हाथ रखते हुए चारो ओर घूमना)"| श्लोक में "दैवतं" शब्द है जिसका Buhler ने भी "idol" अनुवाद किया जो सही है, क्योंकि राह चलते देव-प्रतिमा ही तो मिल सकती है जिसकी प्रदक्षिणा की जा सकती है | अतः स्पष्ट है कि मानव सभ्यता और मानव वंश का आरम्भ करने वाले मनु महाराज के काल में भी देव-प्रतिमा की प्रदक्षिणा करने का नियम था | वेदों में मनु महाराज की अनेकों मन्त्रों में स्तुति की गयी है | एक मनु 71 महायुगों तक रहते हैं (एक इन्द्र की भी इतनी ही आयु होती है), अतः दिव्य योनि के ही जीव मनु हो सकते हैं |
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मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद (Buhler) इन्टरनेट से मुफ्त में डाउनलोड कर लें, उसमें "Temple" शब्द सर्च करें, मनुस्मृति में छ श्लोकों में मन्दिर का प्रमाण मिलेगा |
Good article nidhiji. Congrats. If examples were there it can be more good. Thanks
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