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समगोत्री सम्बन्ध का प्रायश्चित

लेखक-  Vinay Jha   2 May ---------------------------- एक महाशय ने आज पूछा है कि समगोत्री विवाह के परिणाम और उसके दोष-निवारण का उपाय बताऊँ | मैं न तो ऋषि हूँ और न देव, सनातन धर्मशास्त्र में संशोधन करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है | किन्तु हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह किस धर्म को चुने | धर्मविरुद्ध कर्म करने का रास्ता और उसके फल से बचने का उपाय बताऊँ ताकि लोग अधिकाधिक ऐसा करें ? आजकल लगभग 8% भाई-बहन में अनैतिक सम्बन्ध हैं, उससे भी अधिक लोग अन्य निकट सम्बन्धियों से अनैतिक सम्बन्ध रखते हैं, किस-किस का पाप मैं धोऊँ ? पराशर ऋषि के अनुसार छठे, सातवें और आठवें भावों में बुध या शनि हो तो जातक को नरक होता है, तथा द्वादशेश यदि सूर्य के साथ हो तब भी नरक होता है | तो कुल मिलाकर कितने लोग महापातकी होंगे ? शनि उपरोक्त तीनों में से किसी एक भाव में हों इसकी प्रायिकता (probability) 33.3% है | अर्थात एक तिहाई लोग इस कारण से नरकगामी बनेंगे | बचे हुए 66.67% में से एक तिहाई उपरोक्त कारण से बुध द्वारा नरकगामी बनेंगे | शनि और बुध दोनों को मिलाकर 55.55% हुआ | बचे हुए 44.44% में से ...

भारत क्यों खो गया था ?

लेखक- श्री विनय झा ----------------------- प्राचीन पद्धति के गुरुकुलों में सभी बच्चों को हर विषय नहीं सिखाये जाते थे, कुण्डली की जाँच करने के पश्चात उनके लिए उपयुक्त विषयों का चयन होता था | प्राचीन काल के गुरूजी आज की तरह एक ही विषय के "विशेषज्ञ" नहीं होते थे, पण्डितों में शास्त्रार्थ की परिपाटी के कारण सदैव अध्ययन करते रहना पड़ता था, पता नहीं कब कौन आकर गुरुआइ छीन कर चेला बना दे !! कुछ अनिवार्य विषय होते थे किन्तु वे भी बच्चे या बच्ची के वर्ण आदि के अनुसार नियत किये जाते थे | उदाहरणार्थ, ब्राह्मण बालक को अपनी शाखा का वेद एवं समस्त वेदांग तो पढ़ना ही पड़ता था | ज्योतिष के अन्तर्गत गणित था | मैकॉले के काल में भारतीय शिक्षा पद्धति का सर्वेक्षण करके Adam Report बनी थी जिसमें उल्लेख है कि लगभग संभी गाँवों में गुरुकुल थे और लगभग हर कोई साक्षर था (लड़कियों के बारे में पूर्ण आंकड़ें उपलब्ध नहीं थे)। उसी रिपोर्ट के अनुसार शूद्र और मुस्लिम बच्चों को मन्त्रविद्या का ज्ञान नहीं दिया जाता था किन्तु अन्य सारे विषय पढाये जाते थे | वर्तमान बांग्लादेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी ब...

राष्ट्र्चिह्न और धर्मचक्र

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लेखक- श्री विनय झा कई लोग समझ नहीं पाते कि क्यों मैं भाजपा की आलोचना भी करता हूँ किन्तु वोट भी भाजपा को देने के लिए कहता हूँ | भाजपा इटली की नहीं बल्कि आपकी अपनी देसी भैंस है, अतः वोट इसी को दें, लेकिन भैंस है, भैंस को सही राह पर चलाने के लिए मजबूत लाठी भी रखें | अब कुछ लोग बिगड़ेंगे कि भैंस क्यों कहता हूँ ! कोई भी पार्टी झुण्ड ही होती है, हालाँकि उसे व्यवस्थित टीम बनाने के प्रयास होते रहते हैं, किन्तु झुण्डवृत्ति 84 लाख योनियों के दीर्घ अभ्यास की देन है, आसानी से छूटने वाली नहीं, और झुण्डवृत्ति तो भैंसवृत्ति ही होती है | लोकतन्त्र का तन्त्र यदि गड़बड़ है तो दोष लोक के मानवों का है जो अपने तन्त्र को ठीक करने का प्रयास नहीं करते | केवल वोट देना ही हमारा कर्तव्य नहीं है, बल्कि उस वोट का सही प्रयोग हो रहा है या नहीं इसकी देखरेख करते रहने का दायित्व भी हमपर ही है, उसके लिए लोक यदि परलोक से किसी अवतार की बाट जोहता रहे तो यह अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ना है | सरकार हमारी ही है, इसे सही राह पर ठीक से चलाना हमारा कर्तव्य है | उदाहरणार्थ, कई लोग शिकायत करते हैं कि जिस तरह कांग्रेस ने विस्...

हिन्दू संतो, महात्माओं को षड्यंत्र से फसाने का कारण व समाधान; प्रवक्ता श...

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श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज के कालखण्ड का निर्धारण

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# खण्डन    लेखक-  अजेष्ठ त्रिपाठी साभार-  https://www.facebook.com/photo.php?fbid=412821469184264&set=a.211433972656349.1073741828.100013692425716&type=3&theater   # श्रीमद्भागवत_गीता_का_समयकाल  -- श्रीमद्भागवत गीता भारतीय चिंतन के सार-तत्व को समझने का सबसे अच्छा स्रोत है। 2 पंक्तियों के कुल 700 श्लोकों की इस छोटी- सी पुस्तिका ने भारतीय मानस को सबसे अधिक प्रभावित किया है और इसे सदा ही सर्वमान्य आध्यात्मिक शास्त्र का स्थान दिया गया है। भारत के सभी प्रमुख चिंतकों ने गीता के संदेश को किसी न किसी रूप में अपना समर्थन दिया है। उनमें से बहुतों ने गीता पर भाष्य लिखे हैं। ऐसा कोई भी भारतीय दार्शनिक, विचारक या धार्मिक नेता नहीं है जिस पर गीता का प्रभाव न पड़ा हो। पिछली एक शताब्दी में ही बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, श्री अरविंद और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विचारकों और सामाजिक नेताओं ने न केवल गीता के संदेश को सराहा है अपितु उसकी अपनी-अपनी दृष्टि से व्याख्या भी की है। उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों...

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है?

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यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है- क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है? जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है। किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में "काल्पनिक" पुराने पापों के लिए दोषी हैं। आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं। ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया। वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया। बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध ...

पाश्चात्योंको म्लेच्छकी उपमा क्यों ?

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पाश्चात्योंको म्लेच्छकी उपमा क्यों ? विदेशी संस्कृतिसे प्रभावित एवं विदेशमें रहनेवाले एक जन्म हिन्दूने पूछा है कि आप पाश्चात्योंको म्लेच्छ क्यों कहती हैं ? इसके कुछ कारण इसप्रकार हैं – १. वे मल-मूत्र त्यागने या भोजन करनेके पश्चात् जलकी अपेक्षा कागदसे स्वच्छता करना, अधिक उचित समझते हैं और इसको वे सभ्य समाजका प्रतीक समझते हैं । २. अनेक दिवसोंतक वे स्नान नहीं करते हैं । (यह न कहें कि वहां ठण्ड है इसलिए वे ऐसा करते हैं, मैं कश्मीर जा चुकी हूं, कडकती ठण्डमें कश्मीरी पण्डितोंको प्रतिदिन स्नान करते देखा है ।) ३. स्वेदकी (पसीनेकी) दुर्गन्धको दूर करने हेतु अनिष्ट शक्तियोंको आकर्षित करनेवाले कृत्रिम एवं रासायनिक सुगन्ध द्रव्यों अर्थात् deodrant और ‘इत्र’का उपयोग करते हैं । ४. वे अपनी सन्तानोंको सोलह वर्षके पश्चात् वैसे ही त्याग देते हैं जैसे पशु-पक्षी अपने बच्चोंको थोडा भी आत्मनिर्भर देख छोड देते हैं । ५. स्त्रियां उनके लिए मात्र भोगकी वस्तु होती हैं । ६. विवाह वे मात्र अपनी लैंगिक इच्छाओंकी तृप्ति हेतु करते हैं और यदि उसकी पूर्ति बिना विवाहके हो जाए तो वे विवाह रुपी संस्थामें ...

ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में पुरुष का अर्थ

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ब्राहमण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र को वेदों से जोड़ कर वेदों के पुरुष सूक्त से दिखाया जाना भ्रमित करता है \ क्योंकि वेदों में पुरुष सधारण मनुष्य नहीं है |  पुरूष का मनुष्यरूप विवेचन तो वेदों के अनंत काल पश्चात वेदांत उपनिषद काल से प्रारम्भ हुआ है |  इस के लिए निम्न विवेचना देखिए ;वैदिक वाङ्मय में पुरुष शब्द से अभिप्राय:- आजकल अल्पज्ञान और मतिमन्द होने के कारण बहुत से लोग पुरुष से अभिप्राय केवल अंग्रेजी के जेण्ट्स से लेते हैं । वैदिक वाङ्मय में पुरुष शब्द के अनेक अभिप्राय उपलब्ध हो ते हैं । आइए देखते हैं कि पुरुष शब्द का क्या अभिप्राय हैः---  (१.) पुरुष शब्द परमात्मा का वाचकः--- सृष्टि विद्या के विषय में अति प्राचीन आर्यग्रन्थकार सहमत हैं कि वर्त्तमान दृश्य जगत् का आरम्भ परम पुरुष अविनाशी , अक्षर अथवा परब्रह्म से हुआ । तदनुसार पुरुष शब्द मूलतः परब्रह्म का वाचक है । (२.) हिरण्यगर्भ का वाचकः--- पुरुष शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं हिरण्यगर्भ अथवा प्रजापति के लिए भी हुआ है वेदांत में पुरुष को मनुष्यपरक माना है । (३.) मनुष्यपरकः--- पुरुष शब्द का तीसरा मनुष्यपरक अर्थ सुप्रसिद्ध ...