अकबर की शादी “जोधा बाई” से नहीँ "मरियम-उल-जमानी" से हुयी थी जो कि आमेर के राजा भारमल के विवाह के दहेज में आई परसीयन दासी की पुत्री थी। वैसे तो बहुत प्रयास किए गये हिँदुओँ को अपमानित करने के लिये लेकिन एक सच ये भी है।। 1 – अकबरनामा (Akbarnama) में जोधा का कहीं कोई उल्लेख या प्रचलन नही है।।(There is no any name of Jodha found in the book “Akbarnama” written by Abul Fazal) 2- तुजुक-ए-जहांगिरी /Tuzuk-E-Jahangiri (जहांगीर की आत्मकथा /BIOGRAPHY of Jahangir) में भी जोधा का कहीं कोई उल्लेख नही है। (There is no any name of “JODHA Bai” Found in Tujuk -E- Jahangiri ) जब की एतिहासिक दावे और झूठे सीरियल यह कहते हैं की जोधा बाई अकबर की पत्नि व जहांगीर की माँ थी जब की हकीकत यह है की “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोइ नाम नहीं है, जोधा का असली नाम {मरियम- उल-जमानी}( Mariam uz-Zamani ) था जो कि आमेर के राजा भारमल के विवाह के दहेज में आई परसीयन दासी की पुत्री थी उसका लालन पालन राजपुताना में हुआ था इसलिए वह राजपूती रीती रिवाजों को भली भाँती जान्ती थी और राजपूतों में उसे ह...
Original writer- Vinay Jha, https://www.facebook.com/vinay.jha.906/posts/1279166025428032 ========================================================================= चक्रवर्तियों की सूची में 12 नाम तो अनेक स्रोतों में मिलते हैं, कई सन्देहास्पद हैं | वैसे भी सूर्यचक्र में 12 अरे होते हैं, अतः सूर्यवंश में 12 चक्रवर्ती होने की बात ही तर्कसंगत लगती है, हो सकता है इसी आधार पर संख्या 12 तक ही कल्पित कर ली गयी हो | "चक्रवर्ती" की पारंपरिक परिभाषा है "पृथ्वीचक्रम् वर्तते" = समुद्रपर्यंत समस्त भूमि पर जिसका चक्र चले | मैत्रेय उपनिषद, महाभारत, बौद्ध तथा जैन साहित्यों में चक्रवर्तियों का उल्लेख है | जिन बारह चक्रवर्तियों की सूची उपलब्ध है, वे सब के सब सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश के) थे :-- भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्ति, कुन्थु, अर, कार्तवीर्य, पद्म, हरिषेण, जय, ब्रह्मदत्त | यह सूची आज से एक हज़ार वर्ष पहले के ग्रन्थों में है, जब भारत से बाहर का भूगोल भी भारत के पण्डित भूल चुके थे | ये भरत द्वापर युग के शकुन्तला-पुत्र भरत नहीं, बल्कि सृष्टि के आरम्भ में मनुवंशीय भरत थे जिनक...
प्राचीन भारत में स्त्रियाँ सेनापति एवं राजा होने का भी दायित्त्व संभाल लेती थी, उन्हें उस तरह से शिक्षित ही किया जाता था, इस तरह की कल्पना करना आज करोड़ों सवाल उत्पन्न करता है. अगर आप ऐसी हैं, तो यकीनन आप के चरित्र पर सवाल होगा, या आप मर्द समझी जायेंगी. मूर्खों ने ये भी समझना छोड़ दिया है, की किसी भी व्यक्ति के सजीव रहने के लिए स्त्री व पुरीष तत्व का समय समय पर मजबूत होना परमावश्यक है, अन्यथा वो जीव इस धरती पर जीवित नहीं रह सकता..... अब विदेशी दानव सभ्यताओं से प्रेरित समाज में स्त्रियों को वंशावली में स्थान तक नहीं दी जाती है, तो समाज में स्त्रियों के अन्दर मानवीय गुणों का होना एक तरह से अचंभित तो करेगा ही, एक तरह से समाज अधिकाधिक रूप से संवेदनाविहीन निर्जीव तथा सड़ी गलित मानसिकता वाला बन चूका है. अधिक शिक्षा ग्रहण कर लेना भी अभिशाप मानते हैं., क्यूंकि इससे मर्दों के झूठे मूर्खता पूर्ण घमंड को ठेस पहुँचती है. इसी मूर्खता के पोषण होने के चलते ही हिंदुत्व अपनी समाप्ति पर पहुचं चूका है. इस तरह की मानसिकता, विदेशी आक्रमण-कारियों, हमलावरों, ईसाईयों, गौ-क़त्ल करने वालों के ह...
टीवी से इतिहास पढेंगे ? अजमेर के सरकारी संग्रहालय में वे सिक्के रखे हैं जिनकी मैंने लेख में चर्चा की है, और उनके बारे में तीस वर्षों से NCERT की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई हो रही है | लेकिन अधिकाँश लोग स्कूल में ठीक से पढ़ाई नहीं करते, और जो लोग करते भी हैं वे स्कूल के निकलने के बाद अधिकाँश बातें स्कूल में ही छोड़ देते हैं | पृथ्वीराज के दरबारी चारण चन्दरबरदाई की कविता को इतिहास मानने वालों ने स्कूल में इतिहास का अध्ययन ठीक से नहीं किया, चोरी करके परीक्षा में उत्तीर्ण होते रहे हैं, वरना NCERT की इतिहास की पुस्तक पढ़े रहते तो जानते कि पृथ्वीराज युद्ध में नहीं मरा और मुहम्मद गोरी को दिल्ली सौंपकर उसके अधीन अजमेर का राजा बना रहा जिसके सबूत के तौर पर सिक्के मिले हैं जिनके एक ओर मुहम्मद गोरी को बादशाह मानकर दूसरी ओर पृथ्वीराज को अजमेर का अधिपति बताया गया है । चन्दरबरदाई के झूठ का प्रमाण यह है कि उसके अनुसार पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण द्वारा मुहम्मद गोरी को मारा जिसके बाद पृथ्वीराज और चन्दरबरदाई ने एक दूसरे को वहीं पर मार डाला । इस सफ़ेद झूठ को इतिहास मानने वाले इतना भी नहीं सोचते कि यदि यह सच ...
ब्राहमण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र को वेदों से जोड़ कर वेदों के पुरुष सूक्त से दिखाया जाना भ्रमित करता है \ क्योंकि वेदों में पुरुष सधारण मनुष्य नहीं है | पुरूष का मनुष्यरूप विवेचन तो वेदों के अनंत काल पश्चात वेदांत उपनिषद काल से प्रारम्भ हुआ है | इस के लिए निम्न विवेचना देखिए ;वैदिक वाङ्मय में पुरुष शब्द से अभिप्राय:- आजकल अल्पज्ञान और मतिमन्द होने के कारण बहुत से लोग पुरुष से अभिप्राय केवल अंग्रेजी के जेण्ट्स से लेते हैं । वैदिक वाङ्मय में पुरुष शब्द के अनेक अभिप्राय उपलब्ध हो ते हैं । आइए देखते हैं कि पुरुष शब्द का क्या अभिप्राय हैः--- (१.) पुरुष शब्द परमात्मा का वाचकः--- सृष्टि विद्या के विषय में अति प्राचीन आर्यग्रन्थकार सहमत हैं कि वर्त्तमान दृश्य जगत् का आरम्भ परम पुरुष अविनाशी , अक्षर अथवा परब्रह्म से हुआ । तदनुसार पुरुष शब्द मूलतः परब्रह्म का वाचक है । (२.) हिरण्यगर्भ का वाचकः--- पुरुष शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं हिरण्यगर्भ अथवा प्रजापति के लिए भी हुआ है वेदांत में पुरुष को मनुष्यपरक माना है । (३.) मनुष्यपरकः--- पुरुष शब्द का तीसरा मनुष्यपरक अर्थ सुप्रसिद्ध ...
जौनपुर सुल्तान के राज्य में सूफी सन्त मालिक मुहम्मद जायसी ने 1540 ईसवी में अवधी भाषा में "पद्मावत" काव्य की रचना की जिसने महारानी पद्मावती के आख्यान को लोकप्रिय बना दिया | उसी शती में चित्तौर के महाराणा रत्नसिंह के प्रमुख सामन्त गोरा और बदल पर भी (हेमरतन द्वारा ' गोरा बादल पद्मिनी चौपाल') लोकगाथाएं लिखी गयीं | और भी अनेक कथाएं और गीत प्रचलित हुए, मोटे तौर पर उन सबकी मूल कथाओं में साम्य है, जिस कारण आधुनिक युग के छद्म-सेक्युलर इतिहासकारों का कथन है कि महारानी पद्मावती केवल साहित्यिक कल्पना हैं जिनका आधार जायसी की कल्पना है | "पद्मावत" काव्य के अनुसार चित्तौर शरीर की प्रतीक है, महाराणा रत्नसिंह (पद्मावत में रतनसेन) उस शरीर के मन हैं, सिंहल हृदय है जहां की राजकुमारी पद्मावती थीं, पद्मावती ज्ञान की प्रतीक थीं, और अलाउद्दीन वासना का | "पद्मावत" काव्य के अनुसार नारियां चार प्रकार की होती हैं जिनमें सर्वोत्तम नारियों को "पद्मिनी" कहा जाता है, वे केवल सिंहल में ही होती हैं और उनमें सर्वोत्तम का नाम पद्मावती था | जिन लोगों ने "पद्मावत...
ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में, परम पुरुष के चरणों से शूद्रों, जाँघों से वैश्य, भुजाओं से क्षत्रिय एवं मुख से ब्राह्मण को उत्पन्न बताया गया है. इसी तरह से उसी विराट पुरुष के मस्तक से द्यू लोक, नाभि से आकाश एवं चरण से इस पृथ्वी लोक कि उत्पत्ति हुई है. . इन श्लोकों का ये मतलब नही बताया गया है कि, कोई वर्ण उच्च हुआ और कोई वर्ण निम्न हुआ, अगर मनुष्यों के उच्च-नीच की लोलुपता इस दुनिया में मानी ही जानी होती तो पृथ्वी भी अछूत मानी जानी चाहिए. . ये उंच नीच का जन्म मनुष्यों से अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिए किया है. न कि भगवान ने उन्हें जन्मसिद्ध अधिकार दिया है. इन श्लोकों के बाद सभी वर्णों का कर्तव्य भी बताया है, लेकिन इन्हें जानने से पहले ही मानव अपने स्वार्थ-सिद्धि और स्वार्थ पूर्ती में ऐसा उलझा कि पुरुष सूक्त एवं इसके बाद के श्लोकों का कोई मतलब ही नही है. . भगवान ने भी सोचा होगा कि किसे उपदेश दे दिया !! भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में कर्मयोग एवं चौथे अध्याय तथा १६-१८ अध्याय तक सभी तरह के मानवों के कर्मों, गुणों, सभी वर्णों के बारे में एवं कर्मयोग के बारे में बताया है, कहीं पे भी जन्म आधारित आजीवि...
हमारे भविष्य पुराण में शुरूआती अध्याय में भविष्यवाणी की गयी है महा-मद नाम के व्यक्ति के बारे में, स्थान पता सब लिखा हुआ है. ये व्यक्ति इस धरती पे पैशाचिक धर्म की स्थापना करेगा, जिसके बारे में सब कुछ ठीक वैसे ही जैसा रहन सहन मुस्लिमो के तरह है, अर्थात महा-मद मतलब महा-मतलबी धर्म एवं कृत्यों की स्थापना करने वाला. इसका वर्णन का मतलब ये थोडा ही न हुआ कि महा-मद कोई भगवान है !! . इसको अजीब अजीब नाम दिया है भविष्य पुराण में. लिंगो-च्छेदी इत्यादि. महा-मद अर्थात - मजबूत लीक में हाथी, अत्यधिक या हिंसक लीक, मादकता and नशा. इसका जन्म-कुंडली भी यही बताता है. आप किसी एक्सपर्ट पंडित को पूछियेगा. . कई शांतिप्रिय विशेष लोग इस पक्ष में मजबूत एवं दृढ विचारधारा के हैं कि नहीं, इन लोगों में तो कई अच्छी बातें भी हैं, लेकिन, सौ में पांच बात जनता की भलाई के लिए हों तो, वो धर्म नहीं माना जा सकता. अधिकतर कुरआन का उद्धरण देने वाले झूठ बोलते हैं, क्यूंकि पुराण एवं वेद में कभी n झूठ का सहारा लिया गया है और n इसे कहीं पे सराहा गया है. बलि प्रथा का भी अन्य मतलब है, आज के बलि की तरह नही है. खैर.... प्रथ्वी पे अप...
By Dr. Vinay Jha जो अपनी शाखा के वेद को स्मृति द्वारा बचाकर रखे और उसकी व्यवहारिक विधि का ज्ञाता हो उसे ब्राह्मण कहते हैं | ऐसे ब्राह्मण अब बहुत कम हैं जो वेद का पाठ भी नियमित रूप से करते हैं | अब वेद का लाभ भी नहीं जानते, उसमें सन्देह करते हैं | अपनी शाखा के बाद अन्य वेद पढ़ने वाले को द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी कहते थे | यज्ञ में चतुर्वेदी ही ब्रह्मा बन सकता था | अब वास्तविक चतुर्वेदी कोई नहीं है, केवल नाम के लिए हैं | रामायण आदि का पाठ करने वाले पाठक हुए | मिश्रित ब्राह्मणोचित कर्म वाले 'मिश्र' हैं | प्राचीन काल में वेद पढ़ाने वाले शिक्षक को उपाध्याय कहते थे ; (उप) पास नीचे बैठे शिष्य को उसका (स्वशाखा का वेद) अध्याय पढ़ाने वाला | अपभ्रंश में उसका उपाज्झा > ओझा और झा हो गया, आज से लगभग एक सहस्र वर्ष पूर्व | काशी विद्वानों के प्रभाव में रही, अतः वहां और आसपास 'उपाध्याय' बना रहा | बंगाल में इन्हीं शिक्षकों ने आर्य संस्कृति का प्रसार किया और वंदोपाध्याय, चट्टोपाध्याय, गंगोपाध्याय एवं मुखोपाध्याय कहलाये जो वहां आज भी प्रवासी ब्राह्मण माने जाते हैं | उधर अपभ्रंश म...
श्रीराधातत्त्वविमर्श - ०१ & 02 शास्त्रों के परम्परागत ज्ञान और आचरण से विमुख जनों के मन में एक भ्रम बहुत शीघ्रता से व्याप्त हो रहा है कि राधा नामक कोई चरित्र था ही नहीं, यह बाद के कवियों या विधर्मियों ने भगवान् श्रीकृष्ण को बदनाम करने के लिए मिलावट कर दी। इस कुतर्क के पक्ष में वे यह कहते हैं कि यदि राधा का कोई अस्तित्व होता तो क्या श्रीमद्भागवत जैसे महत्वपूर्ण वैष्णव ग्रन्थ में उनका उल्लेख नहीं होता ? अब इस बात का उत्तर देने के चक्कर में आज के कुछ अभिनव कथावाचक बिना सम्प्रदायानुगमन के ही श्रीमद्भागवत में कहीं भी र और ध शब्द की संगति देखकर वहीं हठपूर्वक राधाजी को सिद्ध करने बैठ जाते हैं। वर्तमान में आधावन्तः/राधावन्तः शब्द में वितण्डापूर्वक राधाजी को सिद्ध करने का कुप्रयास प्रसिद्ध है ही। और राधावान् बताया भी किसे जा रहा है ? कबन्धों को। देवता तो अमृतपान कर चुके थे, सो उनका कबन्धीकरण सम्भव नहीं, वैसे भी कबन्ध तो सुरों के नहीं, असुरों के ही बने हैं - कबन्धा युयुधुर्देव्याः। तो कुछ महानुभाव कबन्धों को ही राधाभक्त सिद्ध करने लग गए। गुरुजनों ने व्याकरण पढा है, वर्...
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कानूनों से फर्क पङता है. किसी देश की अर्थव्यवस्था कैसी है जानना हो तो पता लगाओ की उस देश की न्याय प्रणाली कैसी है. देश में आर्थिक सामाजिक विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था कड़ी न हो.
राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक-क्षमता में, अगर कोई देश अन्य देशों पर निर्भर रहता है तो उस देश का धर्म, न्याय, संस्कृति, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, अनुसंधान व जनता तथा प्राकृतिक संसाधन कुछ भी सुरक्षित नहीं रह जाता.
वही राष्ट्र सेक्युलर होता है, जो अन्य देशों पर हर हाल में निर्भर हो.