ज्योतिषीय उपचार के पाँच प्रकार

ज्योतिषीय उपचार पाँच प्रकार के होते हैं :-
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(1) जिस ग्रह की शान्ति करनी हो उसका वारव्रत | राहू के लिए शनिवार और केतु के लिए मंगलवार है | जिस प्रकार लोग रविव्रत या मंगलव्रत करते हैं वही तरीका ठीक है | व्रत के दिन केवल फलाहार से काम चला सकें तो सर्वोत्तम | दोपहर के बाद और सूर्यास्त से पहले फलाहार शरीर को दें ("मैं खा रहा हूँ" - यह भाव न रखें, यह देहवादी आसुरी भाव है | गीता का आदेश है कि देह को जो कुछ दें वह वैश्वानर अग्निदेव को दें |) | सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक वार रहता है, ईसाई पद्धति में मध्यरात्रि से "दिन" का आरम्भ होता है जो पागलपन है | मुसलमानों (और भारतीय शास्त्रों के अनुसार असुरों) में सूर्यास्त से "दिन" का आरम्भ होता है | स्वयं व्रत करने योग्य न हों तो निकटतम सम्बन्धी द्वारा भी अपने नाम के संकल्प सहित व्रत करा सकते हैं |
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(2) उस ग्रह के वैदिक मन्त्र का उचित संख्या में जप | अपनी शाखा के वेद का मन्त्र जपना चाहिए | उत्तर भारत के लगभग 95% लोगों का वेद है शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता की माध्यन्दिन शाखा | शेष का वेद है सामवेद की कौथुमी शाखा | अन्य शाखा वाले अत्यल्प हैं | दक्षिण भारतीयों का मुख्य वेद है कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता | महाराष्ट्र और केरल में ऋग्वेदीय भी मिल जाते हैं | जो ब्राह्मण नहीं हैं उनके कुल के जो ब्राह्मण परम्परा से होते आये हैं उन ब्राह्मणों की वैदिक शाखा ही मान्य होती है | जप के वैदिक मन्त्र और उनके जप की संख्या इस webpage पर मिलेगी :-
http://vedicastrology.wikidot.com/graha-shanti-propitiation…
उक्त webpage की सारी बातें नहीं मानें, मेरे पञ्चांग के सम्पादक ने बहुत सी बकवास भी जोड़ दीं है ताकि बाज़ारू धन्धेबाज पण्डितों को प्रसन्न रखा जा सके | वैदिक मन्त्र का जप यज्ञोपवीत वाले ब्रह्मचारी और सुसंस्कारी ब्राह्मण बालक से कराएं, 12-13 वर्ष से अधिक न तो तो बेहतर | उसे बिना मांगे पर्याप्त दक्षिणा दें, जो स्वयं पैसा मांगे उससे जप न कराएं | जितने दिन जप में लगते हैं उसके लिए शारीरिक मजदूरी की न्यूनतम सरकारी दर से कम न दें, वरना पाप लगेगा |
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(3) उस ग्रह का पौराणिक स्तोत्रपाठ, प्रतिदिन दस या सौ बार | स्वयं करें तो सर्वोत्तम, स्वयं सम्भव न हो तो निकटतम सम्बन्धी से कराएं | उच्चारण और खानपान शुद्ध हो तो पौराणिक स्तोत्रपाठ हेतु जाति का बंधन नहीं है | उपरोक्त webpage के नीचे FILES बटन द्वारा सारे पौराणिक स्तोत्रपाठ मिल जायेंगे |
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(4) उस ग्रह के रत्न की समुचित धातु में अँगूठी | उपरोक्त webpage पर ही वर्णन मिल जाएगा |
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(5) इसके अलावा जिस देवी-देवता में आपकी अधिक आस्था हो उनकी पूजा आदि भी कर सकते हैं |
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जबतक उक्त ग्रह की दशा चले तबतक वारव्रत, पौराणिक स्तोत्रपाठ तथा अँगूठी का त्याग न करें, किन्तु वैदिक मन्त्रजप आरम्भ में एक बार ही करना चाहिए |


Vinay Jha

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